हिटलर से सुभाष चंद्र बोस की मुलाक़ात:नेताजी सुभाष चंद्र बोस और एडोल्फ हिटलर की मुलाकात इतिहास का एक बहुत ही पेचीदा और हैरतअंगेज अध्याय है। यह मुलाकात महज दो नेताओं का मिलना नहीं था, बल्कि एक देशभक्त की अपने वतन की आजादी के लिए जद्दोजहद की पराकाष्ठा थी।इतिहास के पन्नों में 29 मई, 1942 की वो तारीख सुनहरे और कुछ भारी अक्षरों में दर्ज है, जब जर्मनी के बर्लिन में ‘नेताजी’ और ‘हिटलर’ का सामना हुआ। यह कोई दो दोस्तों की मुलाकात नहीं थी, बल्कि एक मजबूर वतन के एक निडर सिपाही की उस दुश्मन से मदद माँगने की कोशिश थी, जो उसके दुश्मन (अंग्रेजों) का दुश्मन था।कहते हैं जब नेताजी हिटलर के कमरे में पहुँचे, तो हिटलर ने उन्हें काफी देर इंतजार करवाया ताकि वे दबाव महसूस करें। लेकिन नेताजी की ख़ुद्दारी ऐसी थी कि जब हिटलर कमरे में आया और नेताजी की पीठ की तरफ से हाथ बढ़ाना चाहा, तो नेताजी ने बिना मुड़े ही पहचान लिया।जब बातचीत शुरू हुई, तो हिटलर अपने घमंड में डूबा हुआ था। लेकिन नेताजी ने उसकी आँखों में आँखें डालकर दो टूक शब्दों में बात की। उन्होंने हिटलर को उसकी किताब ‘मीन कैम्फ’ (Mein Kampf) में भारतीयों के खिलाफ लिखी गई गलत बातों को बदलने की हिदायत तक दे डाली। यह एक ऐसा काम था, जिसकी कल्पना उस दौर में दुनिया का कोई भी बड़ा नेता नहीं कर सकता था।कई लोग सवाल उठाते हैं कि एक लोकतांत्रिक सोच वाले नेताजी तानाशाह के पास क्यों गए? इसका जवाब उनकी वतन-परस्ती में छिपा है।नेताजी का मानना था कि दुश्मन का दुश्मन दोस्त होता है। उनका मकसद हिटलर की विचारधारा का समर्थन करना नहीं था, बल्कि जर्मनी में कैद भारतीय सैनिकों को रिहा करवाकर ‘आज़ाद हिंद फौज’ का गठन करना था। उन्होंने हिटलर से साफ़ कहा कि उन्हें जर्मनी की सेना नहीं, बल्कि अपने ही देश के वो सिपाही चाहिए जो देश की खातिर लड़ सकें।इस मुलाकात में नेताजी को समझ आ गया था कि हिटलर सिर्फ अपने फायदे के लिए भारत का इस्तेमाल करना चाहता है। अपनी दूरदर्शिता) से उन्होंने तुरंत भांप लिया कि यूरोप की सहायता से भारत को आजाद कराना मुमकिन नहीं होगा। और यहीं से शुरू हुआ उनका वो सफर, जहाँ वे एक पनडुब्बी के जरिए मौत से खेलते हुए जापान की तरफ रवाना हुए।नेताजी की शख्सियत इतनी बुलंद थी कि तानाशाह भी उनकी बहादुरी और हाजिर जवाबी का कायल हो गया था।नेताजी और हिटलर की ये मुलाकात हमें सिखाती है कि जब मकसद महान हो, तो इंसान दुनिया की सबसे कठिन और विवादित राहों पर भी चलने का जिगरा रखता है। उन्होंने अपनी साख दांव पर लगा दी, बदनामियां झेलीं, लेकिन अपने देश की आज़ादी के साथ कभी समझौता नहीं किया।











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