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महराना प्रताप जब रो पड़े

जब महाराणा प्रताप रो पड़े 👇कविराज श्यामलदास अपने ग्रंथ वीर विनोद मे लिखते हैं कि कैसे हल्दीघाटी के युद्ध मे चेतक ने महाराणा प्रताप की रक्षा करते हुए उन्हे सुरक्षित एक नाले से पार पहुंचाया और कैसे महाराणा प्रताप ने उसे अंतिम विदाई दी। महाराणा प्रताप और उनके वफ़ादार साथी चेतक की यह दास्तान महज़ एक जंग की कहानी नहीं है, बल्कि यह अज़ीम वफ़ादारी और बेमिसाल जज़्बे का एक ऐसा फ़साना है जो आज भी आँखों को नम कर देता है।हल्दीघाटी के मैदान में जब घमासान जंग छिड़ी थी, तब महाराणा प्रताप अपने जाँबाज़ घोड़े चेतक पर सवार होकर दुश्मन की पंक्तियों को चीर रहे थे। उस वक़्त जो मंज़र पेश आया, वो तारीख़ में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।जंग के दौरान चेतक का एक पैर ज़ख़्मी हो चुका था, लेकिन अपने मालिक की हिफ़ाज़त का जुनून उस पर सवार था। जब मुग़ल फ़ौज ने महाराणा को चारों तरफ़ से घेर लिया, तब ज़ख़्मी चेतक उन्हें उस भँवर से निकाल कर बिजली की रफ़्तार से भागा।रास्ते में एक चौड़ा नाला था, जो किसी भी आम घोड़े के लिए एक नामुमकिन रुकावट थी। पीछे मौत साया बनकर मँडरा रही थी। चेतक ने अपनी आख़िरी ताकत समेटी और एक ऐसी उड़ान भरी कि 26 फ़ीट का वो नाला एक ही छलाँग में पार कर लिया।नाला पार करते ही चेतक की हिम्मत जवाब दे गई और वो ज़मीन पर गिर पड़ा। महाराणा प्रताप ने जैसे ही अपने इस जाँनिसार साथी का सर अपनी गोद में रखा, उनकी आँखों से अश्कों का सैलाब बह निकला। वो योद्धा जो दुश्मनों के सामने फौलाद था, अपने बेज़ुबान दोस्त की शहादत पर फूट-फूट कर रोया। एक शायर ने कुछ इस अंदाज़ मे वफादारी के इन पलों को शब्दों मे पिरोया है 👇वो अज़ीम जज़्बा, वो बेमिसाल वफ़ादारी याद रहेगी,तारीख़ के पन्नों में चेतक की वो आख़िरी सवारी याद रहेगी।श्याम नारायण पाण्डेय की मशहूर नज़्म ‘हल्दीघाटी’ में इस मंज़र को बहुत ही पुरअसर ढंग से पिरोया गया है। कर्नल जेम्स टॉड ने भी अपनी किताब Annals and Antiquities of Rajasthan में महाराणा प्रताप के संघर्ष और चेतक की बहादुरी का बहुत विस्तृत वर्णन किया है।#महाराणाप्रताप और #चेतक को सलाम ❤

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