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कौन बनेगा जमुई का विधायक ?

जमुई 2025 :श्रेयसी सिंह की राइफल vs शमशाद आलम की लालटेन—बीच में पान समाज का पत्ता। आईपी गुप्ता की IIP अब महागठबंधन में। पान समाज (तंती-ततमा) का 5-7% वोट EBC खेमे में निर्णायक। 2020 में श्रेयसी ने 41k से जीता। इस बार एम-वाई + पान** = 50%+? श्रेयसी:राजपूत+युवा+मोदी फैक्टर शमशाद: मुस्लिम+यादव+पान क्रांति 11 नवंबर को लोग वोट डालेंगे—कमल खिलेगा या लालटेन जलाएगा?

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की धूम मची हुई है, और जमुई सीट पर नजरें तिकी हैं। यह सीट न केवल अपनी खनिज संपदा और जैन तीर्थस्थलों के लिए जानी जाती है, बल्कि राजनीतिक रूप से भी यह एक हॉटसीट बनी हुई है। यहां मुस्लिम-यादव (एम-वाई) समीकरण का दबदबा रहा है, लेकिन 2020 में भाजपा की निशानेबाज श्रेयसी सिंह ने इसे तोड़कर इतिहास रच दिया। अब 11 नवंबर को होने वाले दूसरे चरण के मतदान से ठीक पहले सवाल उठ रहा है—क्या श्रेयसी सिंह अपनी जीत दोहराएंगी, या आरजेडी के शमशाद आलम एम-वाई वोटों को एकजुट कर अपसेट कर देंगे?जमुई विधानसभा क्षेत्र (संख्या 241) बिहार-झारखंड सीमा पर बसा है, जहां घने जंगल और नक्सल प्रभावित इलाके अब शांति की ओर बढ़ रहे हैं। चोरमारा गांव जैसे इलाकों में 25 साल बाद पहली बार मतदान हो रहा है, जो लोकतंत्र की जीत है। 2020 में श्रेयसी सिंह ने भाजपा के टिकट पर 79,603 वोट (43.89%) हासिल कर आरजेडी के विजय प्रकाश यादव को 41,049 वोटों से हराया था। तीसरे नंबर पर जन अधिकार पार्टी के शमशाद आलम थे, जिन्हें 17,800 वोट मिले। लेकिन इस बार शमशाद आलम ने आरजेडी का दामन थाम लिया है, और वे सीधे श्रेयसी सिंह के खिलाफ उतर पड़े हैं।श्रेयसी सिंह, जो कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडलिस्ट हैं, राजनीतिक रूप से भी कम निशानेबाज नहीं। पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह की बेटी होने का फायदा उन्हें राजपूत और ऊपरी जाति वोटों से मिलता है। 2020 में उनकी डेब्यू जीत को ‘इत्तफाक’ कहने वाले आलोचकों को चुप कराने के लिए वे अब विकास और खेल सुविधाओं पर जोर दे रही हैं। जमुई में स्पोर्ट्स अथॉरिटी स्थापित करने का उनका वादा युवाओं को लुभा रहा है। एनडीए के प्रचार में पीएम मोदी और सीएम नीतीश कुमार का साथ है, जो विकास और कल्याण योजनाओं को हाईलाइट कर रहे हैं। ग्राउंड रिपोर्ट्स बताती हैं कि भाजपा कार्यकर्ता उत्साहित हैं, और युवा मोर्चा जैसे संगठन श्रेयसी के पक्ष में प्रचार तेज कर रहे हैं।दूसरी ओर, आरजेडी के शमशाद आलम मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने पर तुला हैं। 2020 में स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में वे तीसरे नंबर पर थे, लेकिन अब लालू प्रसाद यादव के नेतृत्व वाली महागठबंधन की ताकत उनके साथ है। बेरोजगारी, पलायन और ‘जंगल राज’ के आरोपों से वे एनडीए पर हमला बोल रहे हैं। आरजेडी की रणनीति साफ है—एम-वाई समीकरण को एकजुट कर वोट ट्रांसफर सुनिश्चित करना। लेकिन चुनौती यह है कि जन सूरज पार्टी के अनिल प्रसाद साह त्रिकोणीय मुकाबला बना रहे हैं, जो वोटों को बांट सकता है।चुनाव विश्लेषकों का मानना है कि जमुई में एनडीए का पलड़ा भारी है। 2024 लोकसभा चुनाव में जमुई से लोजपा के अरुण भारती ने आरजेडी को करारी शिकस्त दी थी। राज्य स्तर पर एनडीए को 140-160 सीटें मिलने का अनुमान है, जबकि महागठबंधन 70-90 पर सिमट सकता है। जमुई में श्रेयसी की लोकप्रियता और एनडीए की संगठनात्मक ताकत उन्हें फायदा देगी, लेकिन शमशाद आलम अगर मुस्लिम-यादव वोटों को 80% से ज्यादा एकजुट कर लें, तो मैच रोमांचक हो सकता है।मतदान से पहले जमुई की सड़कों पर नारे गूंज रहे हैं—”श्रेयसी सिंह जिंदाबाद” या “आरजेडी की जय”। लेकिन अंतिम फैसला तो वोटर ही करेंगे। क्या 2020 की तरह कमल खिलेगा, या लालू का तारा चमकेगा? 1.श्रेयसी सिंह या 2.शमशाद आलम

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